पटना लोकप्रिय लोकगायिका और सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाली मैथिली ठाकुर ने बिहार के सरकारी अस्पतालों की स्थिति को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री के जवाब पर असंतोष जताते हुए कहा कि बिहार के अस्पतालों की जमीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच बड़ा अंतर है। उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
अस्पतालों की स्थिति पर चिंता
मैथिली ठाकुर ने कहा कि बिहार के कई सरकारी अस्पतालों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। उन्होंने मरीजों को समय पर इलाज न मिलने दवाओं की अनुपलब्धता डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया। उनके मुताबिक ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में हालात और भी चिंता जनक हैं। उन्होंने कहा सरकार के आंकड़े कुछ और कहते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर मरीज और उनके परिजन अलग ही सच्चाई झेल रहे हैं।
मंत्री के जवाब पर उठे सवाल
मैथिली ठाकुर ने स्पष्ट रूप से कहा कि स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दिया गया जवाब संतोष जनक नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि यदि व्यवस्था इतनी ही बेहतर है तो फिर अस्पतालों में अव्यवस्था की शिकायतें लगातार क्यों सामने आ रही हैं। उनका कहना है कि केवल बयान देने से हालात नहीं बदलते इसके लिए ठोस कार्रवाई जरूरी है।
सोशल मीडिया पर मिला समर्थन
मैथिली ठाकुर के इस बयान को सोशल मीडिया पर व्यापक समर्थन मिल रहा है। कई लोगों ने अपने अनुभव साझा करते हुए सरकारी अस्पतालों की समस्याओं की पुष्टि की है। कुछ यूजर्स ने इसे आम जनता की आवाज बताते हुए कहा कि प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा ऐसे मुद्दों को उठाना जरूरी है।
सरकार की प्रतिक्रिया
हालांकि, इस मुद्दे पर सरकार की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग ने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए सुधारों और नई योजनाओं का हवाला दिया है। सरकार का दावा है कि अस्पतालों के बुनियादी ढांचे और सेवाओं में लगातार सुधार किया जा रहा है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ी बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बिहार की स्वास्थ्य को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं और ऐसे में जनप्रतिनिधियों व सामाजिक हस्तियों की आलोचना सरकार के लिए चेतावनी हो सकती है।
मैथिली ठाकुर का यह कहना
कि वह मंत्री के जवाब से संतुष्ट नहीं हैं बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर चल रही बहस को और तेज करता है। यह मामला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को कब और कैसे पाटा जाएगा।
