Tere Ishk Mein एक ऐसी Film बनने की कोशिश करती है जो प्रेम, जुनून और ज़हरीले रिश्तों को समझाने का दावा करती है, लेकिन नतीजा ऐसा आता है कि दर्शक असहज और भावनात्मक रूप से थक जाते हैं। एक अजीब-सी कल्पना मन में आती है जैसे किसी दफ्तर के कोने में कई फिल्मों की पटकथाएँ एक-दूसरे पर फिसलकर गिर गई हों: Kabir Singh, Fighter, Ae Dil Hai Mushkil, Dhadkan और बिल्कुल बीच में Raanjhanaa। और किसी ने उन काग़ज़ों से कुछ-कुछ उठाकर एक नई फ़िल्म बना दी हो। यही एहसास TereIshk Mein देती है।

कहानी की शुरुआत: लद्दाख की ठंड, गुस्से से उबलता अफ़सर
कहानी की शुरुआत लद्दाख की खामोशी से होती है, जहाँ Air force के अधिकारी शंकर (Dhanush) अपने ही गुस्से से जूझ रहे हैं। साथियों को युद्ध का डर है, मगर शंकर की लड़ाई खुद से है। उग्र स्वभाव, नियमों से नफरत और आवेग में फैसले यानी वही पुरानी बॉलीवुड स्पेशल्टी। कुछ ही देर में उन्हें ग्राउंड कर दिया जाता है और काउंसलिंग के लिए भेजा जाता है।
Kriti Sounan की एंट्री: उलझी ज़िंदगी और उससे भी उलझी Jimedariya
यहाँ आती हैं कृति सैनन गर्भवती, तनाव में डूबी, हल्का नशा लिए, और दवाइयाँ ऐसे खाती हुई जैसे टॉफी हों। लेकिन फिर भी, उन्हें एक सीनियर ऑफिसर की मानसिक देखभाल का काम सौंप दिया जाता है। और इसी के साथ कहानी फ़्लैशबैक में चली जाती है।
7 साल पहले: “हिंसा अपेंडिक्स की तरह है मुक्ति की थीसिस
सालों पहले की मुक्ति (Kriti) एक साइकोलॉजी छात्रा है, जो मानती है कि हिंसा इंसान के शरीर के बेकार हिस्से जैसी चीज़ है कोई उपयोग नहीं, सिर्फ़ दुख। उसी समय वह शंकर को कॉलेज में लोगों को पीटते देखती है, और जहाँ बाकी लोग भागते, वह सोचती है: अरे, ये तो मेरी रिसर्च का परफेक्ट केस है। Shanker को मुक्ति तब ही मोह लेती है। शादी के सपने भी देखने लगता है।
मैं इसे ठीक कर दूँगी जब प्यार इलाज बनने लगता है
मुक्ति उसे बदलने की जिम्मेदारी खुद पर ले लेती है। Filmo में और कई बार असल ज़िंदगी में भी यह मान लिया जाता है कि एक महिला किसी टूटे इंसान को अपने प्रेम से सुधार सकती है। इस रिश्ते में हिंसा, बचपन के घाव, असमानता, डर सब कुछ है, लेकिन फिल्म बस सतह को छूकर आगे बढ़ जाती है।
मुक्ति और शंकर की प्रेमकथा इतनी उलटी दिशा में चलती है कि दर्शक इससे जुड़ ही नहीं पाते। जब मुक्ति समझती है कि शंकर का प्यार ज़िद और दीवानगी में बदल गया है, वह उसे एक बेहद कठिन शर्त देती है। जब तक शंकर उस शर्त को पूरा करता है, वह आगे बढ़ चुकी होती है। बस फिर क्या sanker की Diwangi और हिंसा और बढ़ जाती है। कुल मिलाकर कहानी आपको बार-बार पूछने पर मजबूर करती है ये सब क्यों?
किरदारों की kamjoriya और अजीब फैसले
Raanjhanaa ने जिस तरह Diwangi को सामान्य बना दिया था, यह फिल्म उससे भी आगे बढ़कर नकारात्मक रिश्तों को चमकदार बनाती है। मुक्ति का किरदार और भी उलझा हुआ लगता है वह पढ़ी-लिखी है, समझदार है, मनोविज्ञान की छात्रा है, लेकिन उसके फैसले इतने अव्यवहारिक हैं कि दर्शक उससे दूरी महसूस करते हैं।
Lagick तो जैसे छुट्टी पर चला गया हो
File में कई जगह तर्क बिखर जाते हैं:
.26–27 साल का व्यक्ति एयर forsh की परीक्षा दे रहा है उम्र सीमा से ऊपर
.3 साल में डॉक्टरेट, फिर पोस्ट-ग्रेजुएशन पढ़ाई के नियम यहाँ शायद अलग हैं
.घर के बाहर सुरक्षा गार्ड मनमर्जी से आते-जाते हैं
इन सब पर सवाल उठने ही लगते हैं।
कहानी लंबी खिंचती है और खिंचती रहती है
करीब 3 घंटे की Film ऐसे लगती है मानो एक बड़ा भोज हो, जिसमें कई व्यंजन परोसे गए हों लेकिन स्वाद किसी में न हो। बीच में UPSC वाला ट्रैक ऐसे चिपकाया गया है जैसे आखिरी समय पर जगह भरने के लिए डाला गया हो। Music में भी सिर्फ़ टाइटल ट्रैक और तमिल गाना ही असर छोड़ते हैं AR Rahman होने के बावजूद यह निराश करता है।
अभिनय Film की एकमात्र मजबूती
Dhanush हर दृश्य को अपने अभिनय से गहराई देते हैं।
कृति सैनन कई शांत पलों में बेहतरीन लगती हैं।
प्रकाश राज इस कहानी की धड़कन हैं उनके दृश्य सच में असर करते हैं।
ज़ीशान अय्यूब आते ही Raanjhanaa की याद जगा देते हैं।
बाकी सह कलाकारों को उतनी जगह ही नहीं मिली कि वे चमक पाते।
निष्कर्ष
Tere Ishk Mein उन दर्शकों को आकर्षित कर सकती है जो जोरदार ड्रामा और ऊँची भावनाएँ पसंद करते हैं। लेकिन नैतिकता, संवेदनशीलता और विषय की गंभीरता के मामले में यह फिल्म गिर जाती है। यह फिल्म यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि 2025 में भी हम ऐसे रिश्तों को रोमांटिक क्यों दिखा रहे हैं, जो असल ज़िंदगी में खतरनाक साबित हो सकते हैं।
