Bihar की दो दशकों से अधिक लंबी Nitish Kumar की सत्ता अब एक बड़ा सवाल खड़ा करती है क्या राजनीति से अलग किया गया शासन सामाजिक परिवर्तन की वास्तविक दिशा दिखा सकता है

सशासन का आरंभिक दौर: उम्मीदों का बिहार
साल 2010 की बात है। उस समय मैं और कई विकास विशेषज्ञ ग्रामीण Bihar के नियमित यात्री थे। मज़ाक में कहा जाता था — अगर तुम्हें “डेवलपमेंट” की नौकरी चाहिए, तो Patna Airport पर खड़े हो जाओ।
उस दौर में न कोई बड़ा होटल था न मॉल, न ही चौड़ी सड़कें — लेकिन bihar में आशा और बदलाव की लहर थी।
लोग “सुशासन बाबू” Nitish kumar की भारी जीत से उत्साहित थे।
Nitish Kumar को bihar को “जंगलराज” से बाहर निकालने का श्रेय दिया गया था।
उनका दूसरा कार्यकाल इस वादे पर टिका था कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को साथ लाकर एक New bihar बनाया जाएगा।
महिलाएं इस परिवर्तन के केंद्र में थीं
साइकिल योजना से लाखों लड़कियों को शिक्षा तक पहुंच मिली।
जीविका समूहों ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया और उन्हें शासन और नागरिकों के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में उभारा।
स्थानीय निकायों में 50% आरक्षण ने राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाई।
कहा जा सकता है कि Nitish Kumar’s ने pm Narendra Modi से पहले ही महिला वोट बैंक की ताकत को समझ लिया था।
बदला हुआ पटना, पर अधूरी रहीं उम्मीदें
अब 2025 में पटना बदल चुका है
एयरपोर्ट चमकदार है, मॉल और हाईवे बन चुके हैं, लेकिन सुशासन की वह चमक फीकी पड़ गई है।
धीमी आर्थिक वृद्धि, बेरोज़गारी, बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार अब रोज़मर्रा की सच्चाई हैं।
लोगों के लिए “सुशासन” अब एक पुरानी याद बनकर रह गया है।
राजनीति और शासन के बीच टकराव
लालू प्रसाद यादव के 1990 के दशक में जातीय समीकरणों को उलटने से लेकर नीतिश कुमार के “सुशासन” और अब की कल्याण-आधारित राजनीति — बिहार का सफर सामाजिक प्रयोगों से भरा रहा है।
मगर असली सवाल अब यह है
क्या बिहार का शासन मॉडल खुद अपनी सीमाओं से परे जाकर वास्तविक सामाजिक परिवर्तन ला सकता है
जो भी सरकार सत्ता में आए, उसे अब यह समझना होगा कि राजनीति और शासन को जोड़ना जरूरी है, न कि शासन क्षमता को दबाना।
जंगलराज’ से सबक
बिहार की मौजूदा समस्याओं को समझने के लिए लालू राज के दौर को भी देखना ज़रूरी है।
राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था तब जानबूझकर कमजोर की गई थी ताकि ऊँची जातियों के प्रभाव से मुक्ति मिल सके।
अधिकारियों को किनारे कर, स्थानीय नेताओं को सत्ता का केंद्र बना दिया गया।
सरकारी पद खाली रखे गए, फंड खर्च नहीं किए गए — ताकि नौकरशाही पर नियंत्रण कमजोर हो जाए।
राजनीतिक रूप से यह एक “सामाजिक न्याय” का प्रयोग था, पर शासन के स्तर पर इसने राज्य की क्षमता को खोखला कर दिया।
आगे का रास्ता
आज, जब बिहार फिर से चुनावी दौर में है, यह स्पष्ट है कि विकास केवल योजनाओं या घोषणाओं से नहीं आएगा।
राज्य को एक ऐसा शासन मॉडल चाहिए जो
राजनीति और प्रशासन को संतुलित करे
महिलाओं, युवाओं और किसानों को नीतियों का केंद्र बनाए,
और समानता व अवसर पर आधारित विकास को आगे बढ़ाए।
सवाल अब यह है कि क्या नई सरकार इस चुनौती को स्वीकार करेगी, या सुशासन की कहानी केवल एक अध्याय बनकर रह जाएगी
