पटना | 6 नवंबर 2025 — बिहार में आज एक बार फिर लोकतंत्र का उत्सव दिखाई दे रहा है। राज्य के 18 ज़िलों में तेज़ रफ़्तार से मतदान जारी है, जहां करीब 7.4 करोड़ से अधिक मतदाता अपने अगले राज्य सरकार का चयन करने के लिए वोट डाल रहे हैं।

विवादों के बीच शुरू हुआ चुनाव
इस चुनाव से पहले मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर संशोधन किया गया था, जिस पर विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इससे असली मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और इसका लाभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिल सकता है। हालांकि, निर्वाचन आयोग और भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया है।
मतदान केंद्रों पर उत्साह, लंबी कतारें
राज्य भर के मतदान केंद्रों के बाहर सुबह से ही लंबी कतारें देखी गईं।
वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग मतदाताओं के लिए स्थानीय प्रशासन ने इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर और विशेष व्यवस्थाएं कीं।
अलीपुर जिले में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला को परिजनों ने चारपाई पर बैठाकर मतदान केंद्र तक पहुँचाया। बीमार होने के बावजूद उन्होंने कहा — “वोट देना मेरा अधिकार है, इसे मैं नहीं छोड़ सकती।”
कई केंद्रों को गुब्बारों और सेल्फी पॉइंट्स से सजाया गया, ताकि युवा मतदाताओं में जोश बना रहे।
शाम 4 बजे तक मतदान प्रतिशत 53.77% दर्ज किया गया।
राजनीतिक समीकरण और प्रमुख दल
बिहार देश के सबसे गरीब, मगर सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में से एक है।
यह अब भी कुछ गिने-चुने राज्यों में से है जहां भाजपा ने अब तक अकेले सरकार नहीं बनाई।
फिलहाल राज्य में भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) यानी जद(यू) की गठबंधन सरकार है, जो इस बार भी साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है।
वहीं, विपक्षी गठबंधन महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और कई छोटे दल शामिल हैं।
चुनाव में नई चुनौती के रूप में प्रशांत किशोर की नई पार्टी भी मैदान में है, जिन्होंने पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के साथ बतौर रणनीतिकार काम किया था।
नीतीश बनाम तेजस्वी: दो दशकों की राजनीति का निर्णायक मोड़
राज्य की राजनीति पर पिछले 40 वर्षों से प्रभाव डालने वाले दो दिग्गज
नीतीश कुमार (जदयू) और लालू प्रसाद यादव (आरजेडी) शायद आख़िरी बार इस चुनाव में सक्रिय रूप से दिख रहे हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो बीते दो दशकों से बिहार की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं, इस बार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं, तेजस्वी यादव विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और जनता के बीच अपने पिता लालू यादव की विरासत को नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
लालू यादव की विरासत और विवाद
1990 से 1997 तक मुख्यमंत्री रहे लालू यादव अपने अलग अंदाज़ और गरीबों के नेता की छवि के लिए जाने जाते रहे हैं।
हालाँकि उनके शासन को भ्रष्टाचार और ‘जंगलराज’ के दौर के रूप में भी याद किया जाता है।
वर्तमान में वे भ्रष्टाचार मामलों में सज़ा के बाद जमानत पर हैं।

मतदाता सूची पर बवाल और महिलाओं की भूमिका
चुनाव से कुछ महीने पहले जारी नई मतदाता सूची में 4.7 लाख नाम हटाए गए, जिससे विपक्ष ने BJP पर धार्मिक और जातीय पक्षपात का आरोप लगाया।
निर्वाचन आयोग और भाजपा ने इसे “डेटा शुद्धिकरण की सामान्य प्रक्रिया” बताया।
विश्लेषकों का मानना है कि इस बार महिलाएं निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं, क्योंकि राज्य में कुल मतदाताओं का लगभग आधा हिस्सा महिलाएं हैं और उनका मतदान प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक संतोष सिंह का कहना है,
बिहार में महिलाएं मुद्दों के आधार पर वोट करती हैं, इसलिए सभी दल उन्हें लुभाने के लिए कल्याणकारी योजनाओं का सहारा ले रहे हैं।”
मसौढ़ी की कुशबू देवी, जो अपने स्थानीय प्रत्याशी के लिए प्रचार कर रही हैं, ने कहा —
जहां महिलाओं की वोटिंग ज़्यादा होती है, वहीं असली बदलाव देखने को मिलता है। इस बार भी महिलाएं मतदान में आगे रहेंगी।
निष्कर्ष
बिहार का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक समीकरण की दिशा तय करने वाला चुनाव है।
क्या मोदी-नीतीश की जोड़ी फिर से कमाल दिखाएगी या तेजस्वी यादव नई शुरुआत करेंगे इसका जवाब 14 नवंबर को मतगणना के बाद मिलेगा।
